इम्युनोग्लोबुलिन टेस्ट (Immunoglobulin Test) क्या है? जानें यह क्यों किया जाता है

Immunoglobulin Test

एक स्तनपान करवाने वाली माँ बहुत सारी चुनौतियों का सामना करती है। आइये जानते है इम्युनोग्लोबुलिन टेस्ट (Immunoglobulin Test) क्या है, क्यों करवाएं और इसके फायदे।

इम्युनोग्लोबुलिन टेस्ट (Immunoglobulin Test) क्या है?

इम्युनोग्लोबुलिन (Immunoglobulin) एक तरह का प्रोटीन है जो हमारा शरीर एंटीजन के विरोध में बनाता है। एंटीजन को हमारा शरीर हानिकारक मानता है। जिनमें बैक्टीरिया, वायरस, कैंसर कोशिकाएं और दूसरे विषाक्त पदार्थ शामिल है।

इम्युनोग्लोबुलिन (Immunoglobulin) कुछ विशेष एंटीजन के विरोध में बनाए जाते है, जिसका मतलब है कि एंटीबॉडी केवल उसी एंटीजन पर हमला करती है जिसके लिए वह बना होता है। उदाहरण के लिए आप ट्यूबरकुलोसिस इम्युनोग्लोबुलिन (Immunoglobulin) ले सकते है जो सिर्फ ट्यूबरकुलोसिस बैक्टीरिया (Tuberculosis Bacteria) पर ही हमला करते है, ये किसी दूसरे बैक्टीरिया के विरोध में कार्य नहीं करते। हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) को भी सब पता होता है।

एक बार जब यह किसी एंटीजन के संपर्क में आ जाती है तो वह बीमारी वाले एंटीजन को याद कर लेती है और अगली बार जब यह एंटीजन शरीर में आते है तो तुरंत उनके विरोध में एंटीबॉडी बन जाती है। कभी-कभी प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से स्वस्थ अंगों और ऊतकों (टिश्यू) के विरोध में भी एंटीबॉडीज बना देती है जिसके कारण ऑटोइम्यून रोग हो जाते है। जिन्हें एंटीबॉडीज या ऑटोएंटीबॉडीज कहा जाता है।

इम्युनोग्लोबुलिन टेस्ट (Immunoglobulin Test) या टोटल इम्युनोग्लोबुलिन टेस्ट (Total Immunoglobulin Test) रक्त में एंटीबॉडीज या फिर इम्युनोग्लोबुलिन (Immunoglobulin)- आइजीए, आईजीजी और आईजीएम की पहचान करता है। इससे पहले या हाल ही में हुए संक्रमण, रोग या ऑटोइम्यून स्थितियों की पहचान करने में मदद मिलती है।

इम्युनोग्लोबुलिन टेस्ट (Immunoglobulin Test) क्यों करते है?

इम्युनोग्लोबुलिन टेस्ट (Immunoglobulin Test) की सलाह निम्न स्थितियों में दे सकते है:

  • बैक्टीरिया या वायरल संक्रमण होने पर
  • नवजात शिशुओं में संक्रमण होने पर
  • कुछ अलग तरह के कैंसर में
  • ऑटोइम्यून विकार जैसे रूमेटाइड आर्थराइटिस
  • बोन मेरो को प्रभावित करने वाले कैंसर के इलाज के लिए
  • एलर्जी
  • इम्युनोग्लोबुलिन के कम स्तर होने के कारण बार-बार संक्रमण होना
  • हेलिकोबैक्टर पाइरोली संक्रमण के इलाज में

यदि डॉक्टर को इम्युनोग्लोबुलिन (Immunoglobulin) के कम स्तर होने की वजह से कोई लक्षण दिखाई दे रहे है तो भी इस टेस्ट को करवाने की सलाह दी जाती है।

  • इम्यून डेफिशियेंसी का पारिवारिक इतिहास
  • असामान्य या बार-बार होने वाले वायरल व बैक्टीरियल संक्रमण
  • फेफड़ों के संक्रमण
  • साइनस संक्रमण
  • लंबे समय से दस्त

इस टेस्ट से जिन तीन इम्युनोग्लोबुलिन (Immunoglobulin) की पहचान की जा सकती है, वह है।

  • आईजीएम
    यह सबसे बड़ा एंटीबॉडी है जो एंटीजन की प्रतिक्रिया के रूप में सबसे पहले बनाया जाता है। आईजीएम पूरे एंटीबॉडीज का 5% से 10% होता है, यह रक्त और लसिका ग्रंथि (Lymphatic Glands) दोनों में पाया जाता है।
     
  • आईजीजी
    आईजीजी सबसे छोटे एंटीबॉडीज है लेकिन ये सामान्य है। यह सारी एंटीबॉडीज का 75% से 80% भाग होता है, यह एंटीबॉडीज वायरल और बैक्टीरियल संक्रमण से लड़ने के लिए जरुरी है। आईजीजी किसी भी तरह के संक्रमण के बाद शरीर में सबसे लंबे समय तक रहते है और संक्रमण को याद रखने में प्रतिरक्षा प्रणाली की मदद करते है। यही वह एंटीबॉडीज है जो दोबारा संक्रमण होने पर तुरंत प्रतिक्रिया करते है।

    इसके अलावा आईजीजी ही केवल अकेला ऐसा एंटीबॉडी है जो गर्भनाल से निकल सकता है, इसीलिए गर्भावस्था के दौरान यह शिशु की रक्षा भी कर सकते है।
     
  • आइजीए
    आइजीए एंटीबॉडीज पूरे एंटीबॉडीज का 15% होता है। यह आंसू, लार, साइनस, फेफड़ों, माँ के दूध और पेट व आंतों के गैस्ट्रिक द्रवों में पाया जाता है। बच्चे के रक्त में जन्म के छह महीने बाद तक आइजीए एंटीबॉडीज नहीं होते, ये एंटीबॉडीज बच्चे में माँ के दूध के द्वारा आते हैं।

मानव दूध इम्युनोग्लोबुलिन के फायदे:

मध्य कान का संक्रमण: 24 अध्ययनों की 2015 की समीक्षा में पाया गया है कि 6 महीने तक अनन्य (Unique) स्तनपान ओटिटिस मीडिया के खिलाफ 2 साल की उम्र तक सुरक्षा प्रदान करता है, जिसमें 43 प्रतिशत की कमी होती है।

श्वसन तंत्र में संक्रमण: एक बड़ी जनसंख्या-आधारित 2017 का अध्ययन दिखाया गया है कि 6 महीने या उससे अधिक समय तक स्तनपान करवाने से 4 साल की उम्र तक बच्चों में श्वसन पथ (Respiratory Tract) के संक्रमण का खतरा कम हो जाता है।

जुकाम और फ्लू: 6 महीने के लिए विशेष रूप से स्तनपान करवाने से आपके बच्चे का जोखिम कम हो सकता है, जो एक अन्य जनसंख्या-आधारित 2010 के अध्ययन के अनुसार ऊपरी श्वसन वायरस (Respiratory Virus) को 35 प्रतिशत तक कम कर सकता है। एक छोटे अध्ययन के स्रोत में पाया कि स्तनपान करने वाले शिशुओं में फ्लू के प्रति प्रतिरक्षा (immunity) विकसित करने में अधिक सफलता मिली।

आंत में संक्रमण: वह शिशु जो 4 महीने या उससे ज्यादा समय तक स्तनपान करते है, जनसंख्या-आधारित 2010 के अध्ययन के अनुसार, जठरांत्र (Gastrointestinal) संबंधी मार्ग के संक्रमण से काफी कम ग्रसित होते है। स्तनपान दस्त या कब्ज में 50 प्रतिशत की कमी और दस्त के कारण अस्पताल में प्रवेश में 72 प्रतिशत की कमी के साथ जुड़ा हुआ है।

सूजन आंत्र रोग (आईबीडी) (Inflammatory Bowel Disease): 2009 के एक अध्ययन के अनुसार स्तनपान से आईबीडी की शुरुआत के 30 प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना कम हो सकती है। हालांकि शोधकर्ताओं ने ध्यान दिया कि इस सुरक्षात्मक प्रभाव की पुष्टि करने के लिए अधिक अध्ययन की आवश्यकता है।

मधुमेह (डायबिटीज): इसके लिए प्राप्त आंकड़ों के अनुसार टाइप 2 डायबिटीज के विकास का जोखिम 35 प्रतिशत तक कम होता है।

बचपन का ल्यूकेमिया: 2017 की समीक्षा में कहा गया है कि कम से कम 6 महीने तक स्तनपान करने से बचपन में ल्यूकेमिया के खतरे में 20 प्रतिशत की कमी आती है।

मोटापा: 2015 की समीक्षा के अनुसार, स्तनपान कराने वाले शिशुओं में अधिक वजन या मोटापा बढ़ने की 26 प्रतिशत कम संभावना होती है।

अस्वीकरण: सलाह सहित इस लेख में सामान्य जानकारी दी गई है। अधिक जानकारी के लिए आज ही अपने फोन में आयु ऐपडाउनलोड कर घर बैठे विशेषज्ञ डॉक्टरों से परामर्श करें। स्वास्थ संबंधी जानकारी के लिए आप हमारे हेल्पलाइन नंबर 781-681-11-11 पर कॉल करके भी अपनी समस्या दर्ज करा सकते हैं। आयु ऐप हमेशा आपके बेहतर स्वास्थ के लिए कार्यरत है। 

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